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इस पौधे की पत्तियां जलती हैं दिए की तरहा , इसे पांडवों की मसाल भी कहा जाता है

प्रकृति  मेँ अब भी ऐसी लाखों करोड़ों वनस्पतियाँ हैं जिनके बारे मेँ हम आजतक कुछ भी नहीं जानते हैं । प्रकृति ने अपने आप मेँ हैरतअंगेज खजाना छिपा रखा है जिसके बारे मेँ हम आजतक नहीं जान पाए हैं । ऐमज़ान के जंगलों के बारे मेँ तो आपने सुना ही होगा की कितने रहस्यमयी जंगल हैं जहां रोजाना कोई ना कोई नया जीव अथवा वनस्पति खोजी जा रही है । 

यह  पाँड़वार पत्ती (पांडवों की मशाल) है

कुदरत हमेशा ही अपने अंदर हजारों राज छुपाए रखेगी चाहे हम कितनी भी खोज कर लें या उन राज से पर्दा उठाने की कोशिस कर लें । लेकिन हमारी कोशिशें भी नाकाम नहीं हुई हैं , प्राचीन काल से ही बहुत - सी ऐसी बातें हैं जो अपने मेँ काफी अनोखी हैं और हमने उनको जान  लिया है । 

आज हम बात करेंगे महाभारत काल के एक ऐसे पौधे की जो बहुत अनोखा है और अपने आप मेँ बहुत - सी खूबियाँ छुपाए हुए है । क्योंकि यह पौधा महाभारत काल का है और इसका संबंध सीधे - सीधे तौर पर पांडवों से है इसलिए इसे पाँड़वार पत्ती (पांडवों की मशाल)  कहा जाता है । 

एक ऐसा पौधा, जिसे महाभारत के पांडवों ने अपने वनवास के दौरान चिमनी की मशाल के रूप में इस्तेमाल करने के लिए रखा था । इसी कारण से इसको पांडवों की मशाल के नाम से भी जाना जाता है । 


आप इसकी ताजा हरी पत्तीयों के साथ भी एक मशाल जला सकते हैं, बस इसकी ताजा हरी पत्तियों की नोक पर तेल की एक बूंद लगाएं । पत्ती की नोक पर लगायी जाने वाली तेल की एक बूंद पत्ती को बाती की तरह जलने योग्य बना देती है और फिर यह हरी पत्ती भी एक दिए की भांति जलती है । 

भारत में और श्रीलंका में केवल पश्चिमी घाट के भीतर पाया जाने वाला यह पौधा तमिलनाडु के अय्यर मंदिर और भैरवर मंदिर की तरह कई दक्षिण भारतीय मंदिरों में उपयोग किया जाता है। हिन्दू धर्म मेँ इस पौधे का विशेष महत्व है और हिन्दू मंदिरों मेँ इस पौधे को लगाया जाता है । 


आशा करते हैं आज की यह जानकारी आपको जरूर पसंद आई होगी , अपने परिवार और मित्रों से शेयर जरूर करें । 


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